सोनिया गांधी की नागरिकता विवाद: भाजपा ने 1983 की नागरिकता से पहले मतदाता सूची में धोखाधड़ी का आरोप लगाया

- Khabar Editor
- 13 Aug, 2025
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भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने कांग्रेस नेता सोनिया गांधी पर एक बड़ा आरोप लगाया है कि उनका नाम भारत की मतदाता सूची में 1980 में जोड़ा गया था, यानी उनके आधिकारिक रूप से भारतीय नागरिक बनने से तीन साल पहले।
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यह आरोप चुनावी निष्पक्षता पर चल रही राजनीतिक बहस के बीच आया है, जहाँ कांग्रेस पार्टी पहले भी भाजपा पर "वोट चोरी" और मतदाता धोखाधड़ी का आरोप लगा चुकी है। बदले में, भाजपा इस ऐतिहासिक आरोप का इस्तेमाल कांग्रेस पार्टी के दावों का खंडन करने और विपक्ष पर पलटवार करने के लिए कर रही है।
प्रेस कॉन्फ्रेंस और सोशल मीडिया पोस्ट में विस्तार से बताए गए भाजपा के आरोपों के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
सोनिया गांधी की नागरिकता: भाजपा का दावा है कि इटली में जन्मी सोनिया गांधी ने 1983 में भारतीय नागरिकता हासिल की थी।
1980 की मतदाता सूची: भाजपा के आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने 1980 की मतदाता सूची की एक प्रति साझा की, जिसमें दिल्ली के सफदरजंग स्थित पते से सोनिया गांधी का नाम शामिल है।
कानूनी उल्लंघन: भाजपा का तर्क है कि यह समावेशन "चुनावी कानून का घोर उल्लंघन" था क्योंकि मतदाता के रूप में पंजीकृत होने के लिए किसी व्यक्ति का भारतीय नागरिक होना आवश्यक है।
बाद की घटनाएँ: मालवीय ने आगे आरोप लगाया कि आपत्तियों के बाद 1982 में उनका नाम मतदाता सूची से हटा दिया गया था, लेकिन 1983 में 1 जनवरी, 1983 की योग्यता तिथि के साथ फिर से दिखाई दिया, जबकि उन्हें उसी वर्ष अप्रैल में नागरिकता प्रदान की गई थी।
जवाब में, कांग्रेस सूत्रों ने कहा है कि ये आरोप भाजपा द्वारा मौजूदा मुद्दों से ध्यान भटकाने और मतदाता धोखाधड़ी के हालिया आरोपों से जुड़े सवालों के जवाब देने से बचने की कोशिश है।
हालाँकि, मैं सोनिया गांधी पर भाजपा द्वारा लगाए गए आरोपों का एक व्यापक और विस्तृत विवरण प्रस्तुत कर सकता हूँ, जो दिए गए पाठ से लिया गया है और राजनीतिक बहस के संदर्भ को विस्तार से प्रस्तुत करता है।
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने वरिष्ठ कांग्रेस नेता सोनिया गांधी पर एक महत्वपूर्ण और विस्तृत आरोप लगाकर राजनीतिक बवाल खड़ा कर दिया है। इस आरोप का मूल यह है कि उनका नाम 1980 में भारतीय मतदाता सूची में जोड़ा गया था, यानी आधिकारिक तौर पर भारतीय नागरिकता प्राप्त करने से पूरे तीन साल पहले। यह आरोप कोई अकेली घटना नहीं है, बल्कि भारत की चुनावी प्रक्रिया की अखंडता को लेकर चल रही और गरमागरम राजनीतिक बहस में एक रणनीतिक जवाबी हमला है।
इस आरोप के महत्व को समझने के लिए राजनीतिक संदर्भ बेहद ज़रूरी है। पिछले कुछ समय से, कांग्रेस पार्टी आक्रामक रुख अपनाए हुए है और भाजपा पर "वोट चोरी" और व्यापक मतदाता धोखाधड़ी के गंभीर आरोप लगा रही है। विपक्ष ने चुनावों की निष्पक्षता को लेकर, खासकर हाल के चुनावों के बाद, लगातार चिंताएँ जताई हैं। सोनिया गांधी के खिलाफ इस ऐतिहासिक आरोप को उठाने का भाजपा का फैसला, चुनावी ईमानदारी के मुद्दे पर कांग्रेस पार्टी के नैतिक अधिकार को बदनाम करने की एक स्पष्ट कोशिश है।
भाजपा के आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय इस कहानी को आगे बढ़ाने वाले प्रमुख व्यक्ति रहे हैं। उन्होंने न केवल मौखिक आरोप लगाए हैं, बल्कि पार्टी के दावों के समर्थन में सबूत भी पेश किए हैं। उनके तर्क के केंद्र में एक दस्तावेज़ है, जिसके बारे में उनका दावा है कि वह 1980 की मतदाता सूची की एक प्रति है। मालवीय के अनुसार, इस दस्तावेज़ में दिल्ली के सफदरजंग स्थित पते पर सोनिया गांधी का नाम स्पष्ट रूप से दर्ज है। भाजपा द्वारा प्रस्तुत समय-सीमा इस प्रकार है:
1980: सोनिया गांधी का नाम कथित तौर पर मतदाता सूची में जोड़ा गया।
1982: आपत्तियों के बाद उनका नाम कथित तौर पर सूची से हटा दिया गया।
1983: उनका नाम 1 जनवरी, 1983 की योग्यता तिथि के साथ सूची में पुनः दिखाई दिया।
अप्रैल 1983: सोनिया गांधी ने आधिकारिक तौर पर भारतीय नागरिकता प्राप्त कर ली।
भाजपा का तर्क चुनावी कानून के एक मूलभूत सिद्धांत पर आधारित है: मतदाता के रूप में पंजीकृत होने के लिए भारत का नागरिक होना आवश्यक है। एक ऐसी समय-सीमा प्रस्तुत करके, जिसमें वह नागरिक बनने से वर्षों पहले मतदाता सूची में थीं, भाजपा इसे "चुनावी कानून का घोर उल्लंघन" बता रही है। पार्टी न केवल सोनिया गांधी पर इस उल्लंघन का आरोप लगा रही है, बल्कि उस समय के भारतीय चुनाव आयोग (ईसीआई) पर भी अप्रत्यक्ष रूप से सवाल उठा रही है, और एक गैर-नागरिक को मतदाता सूची में शामिल करने को एक प्रणालीगत विफलता या यहाँ तक कि जानबूझकर किया गया कदम बता रही है।
यह आरोप केवल एक ऐतिहासिक विवाद का विषय नहीं है; इसके तात्कालिक राजनीतिक निहितार्थ भी हैं। भाजपा इसका इस्तेमाल कांग्रेस पार्टी के मौजूदा चुनाव प्रक्रिया की आलोचना करने के अधिकार को चुनौती देने के लिए कर रही है। संदेश स्पष्ट है: "आप हम पर 'वोट चोरी' का आरोप कैसे लगा सकते हैं, जबकि आपके अपने शीर्ष नेता का इतिहास इतने गंभीर और बुनियादी उल्लंघन से घिरा हुआ है?" भाजपा की रणनीति दोहरी प्रतीत होती है: मतदाता धोखाधड़ी के मौजूदा आरोपों का बचाव करना और साथ ही विपक्षी नेतृत्व की विश्वसनीयता पर हमला करना।
कांग्रेस पार्टी ने अपनी शुरुआती प्रतिक्रिया में, इन आरोपों को काफ़ी हद तक खारिज कर दिया है। पार्टी ने 1980 की मतदाता सूची से जुड़े विशिष्ट दावों पर सीधे तौर पर कोई टिप्पणी नहीं की है। इसके बजाय, कांग्रेस के सूत्रों ने भाजपा के आरोप को "ध्यान भटकाने वाली रणनीति" बताया है। उनका तर्क है कि भाजपा हाल के चुनावों के संचालन को लेकर उठ रहे गंभीर सवालों से ध्यान हटाने की कोशिश कर रही है। इस प्रतिक्रिया से पता चलता है कि कांग्रेस पार्टी भाजपा के इस कदम को एक ठोस कानूनी या नैतिक चुनौती के बजाय एक राजनीतिक पैंतरेबाज़ी के रूप में देखती है। कांग्रेस का प्रति-कथन यह है कि भाजपा "पुराने, घिसे-पिटे आरोपों" का सहारा ले रही है क्योंकि उसके पास अपने खिलाफ मौजूदा आरोपों का कोई विश्वसनीय जवाब नहीं है।
इस राजनीतिक टकराव के व्यापक निहितार्थ महत्वपूर्ण हैं। यह भारत की चुनावी प्रणाली की दीर्घकालिक, अतीत और वर्तमान, अखंडता पर सवाल उठाता है। अगर भाजपा के आरोप सही साबित होते हैं, तो इसका सोनिया गांधी और कांग्रेस पार्टी के बारे में जनता की धारणा पर गहरा प्रभाव पड़ सकता है। इसके विपरीत, अगर आरोप झूठे या निराधार पाए जाते हैं, तो इसे भाजपा द्वारा एक हताश और दुर्भावनापूर्ण हमले के रूप में देखा जा सकता है, जिसका संभावित रूप से सत्तारूढ़ दल पर उल्टा असर पड़ सकता है। बहस अब केवल वर्तमान पर ही नहीं, बल्कि ऐतिहासिक रिकॉर्ड पर भी केंद्रित है, जहाँ दोनों दल भारत में चुनावी नैतिकता के आख्यान को परिभाषित करने की होड़ में हैं। जनता यह देखने के लिए उत्सुक होगी कि यह नाटकीय राजनीतिक आदान-प्रदान कैसे आगे बढ़ता है और क्या इससे देश की ऐतिहासिक और वर्तमान चुनावी प्रक्रियाओं की गहन जाँच-पड़ताल हो पाएगी।
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